जहाँ गैस इकट्ठी हुई, वहीं पहले तारे बने
तारों और आकाशगंगाओं के बनने से ब्रह्मांड का रूप और उसमें मौजूद पदार्थ बदल गए। शुरू में लगभग केवल हाइड्रोजन और हीलियम वाली गैस से तारे बने, और उनके भीतर नए तत्व बनने लगे। तारों से निकले पदार्थ का कुछ हिस्सा बाद में दूसरे तारों और ग्रहों की सामग्री में मिल गया। पृथ्वी की चट्टानों और हमारे शरीर को बनाने वाले पदार्थों में भी इस लंबे बदलाव के निशान मौजूद हैं।
पहले तारों के बनने से पहले भी ब्रह्मांड में प्रकाश था। बहुत गर्म शुरुआती ब्रह्मांड से बचा हुआ, आज तक मौजूद प्रकाश ब्रह्मांडीय सूक्ष्मतरंग पृष्ठभूमि विकिरण कहलाता है। उस समय प्रकाश देने वाले तारे अभी बने नहीं थे। पहले तारे ब्रह्मांड में प्रकाश के एक नए स्रोत बने।
गैस पूरे ब्रह्मांड में एक जैसी नहीं फैली थी। जहाँ पदार्थ अधिक घना था, वहाँ गुरुत्वाकर्षण आसपास की गैस को खींचता था। केंद्र में इकट्ठी होती गैस गर्म हुई और तारे बनने की परिस्थितियाँ तैयार हुईं। आज तारे बनाने वाले बादलों के विपरीत, पहले तारों की सामग्री में भारी तत्व और धूल लगभग नहीं थे। शुरुआती तारे कितने भारी थे और कैसे बने, यह जानने के लिए शोधकर्ता दूर के ब्रह्मांड के अवलोकनों की तुलना भौतिक नियमों पर आधारित गणनाओं से करते हैं।
आकाशगंगाओं में बहुत से तारे अलग-अलग समय पर बने
रात के आकाश में दिखने वाली आकाशगंगा किसी एक तारे से कहीं बड़ी संरचना है। उसमें असंख्य तारे, गैस और धूल गुरुत्वाकर्षण से बँधे होते हैं। डार्क मैटर भी इस संरचना में भूमिका निभाता है। उसे प्रकाश के जरिए सीधे नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके गुरुत्वीय प्रभावों से उसकी मौजूदगी का पता चलता है। तारे बनाने वाले बादल आकाशगंगाओं में कई जगह पाए जाते हैं।
शुरुआती आकाशगंगाएँ आसपास से गैस ग्रहण करके या दूसरी आकाशगंगाओं से मिलकर बदलती रहीं। नई आई गैस से तारे बन रहे थे, जबकि पहले बने तारे अपना जीवन जारी रखे हुए थे। सभी तारे एक साथ पैदा नहीं हुए और न ही एक ही समय पर एक ही अवस्था से गुजरे। इसीलिए एक आकाशगंगा में युवा और पुराने तारे साथ मिल सकते हैं।
खगोलविद दूर की आकाशगंगाओं को देखकर अतीत का अध्ययन करते हैं। प्रकाश को हम तक पहुँचने में समय लगता है, इसलिए लंबे समय से यात्रा करता प्रकाश आकाशगंगा का उतना ही पुराना रूप दिखाता है। अलग-अलग दूरियों की आकाशगंगाओं की तुलना करके और तारों के प्रकाश तथा गैस की संरचना का विश्लेषण करके उनके बदलावों को समझा जा सकता है।
शुरुआती आकाशगंगाओं के प्रकाश ने आसपास की गैस की अवस्था बदली
गर्म तारे हमारी आँखों को दिखने वाले प्रकाश के साथ पराबैंगनी प्रकाश भी छोड़ते हैं। यदि हाइड्रोजन का परमाणु पर्याप्त ऊर्जा वाला प्रकाश सोख ले, तो उसके नाभिक के आसपास मौजूद इलेक्ट्रॉन अलग हो सकता है। परमाणु से इलेक्ट्रॉन के इस तरह अलग होने को आयनीकरण कहते हैं।
शुरुआती ब्रह्मांड में इलेक्ट्रॉन परमाणु नाभिकों से अलग थे। ब्रह्मांड ठंडा होने पर वे जुड़कर परमाणु बनाने लगे। तारों और आकाशगंगाओं के प्रकाश ने उन परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन फिर अलग कर दिए। जिस दौर में यह बदलाव आकाशगंगाओं के आसपास व्यापक रूप से फैला, उसे पुनः आयनीकरण का युग कहते हैं। इसके साथ गैस से प्रकाश के गुजरने का तरीका भी बदल गया।
जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन का इस्तेमाल करने वाले एक अध्ययन ने आकाशगंगाओं को उस समय की अवस्था में देखा, जब ब्रह्मांड की उम्र लगभग 90 करोड़ वर्ष थी। शोधकर्ताओं ने जाँचा कि और भी दूर के एक चमकीले पिंड का कितना प्रकाश बीच की गैस से गुजरता है, फिर उसकी तुलना वेब से मिली आकाशगंगाओं की स्थितियों से की। आकाशगंगाओं के आसपास ऐसे क्षेत्र मिले जहाँ प्रकाश आसानी से गुजरता था। यह नतीजा इस व्याख्या का समर्थन करता है कि उस समय उन आकाशगंगाओं के प्रकाश ने आसपास की गैस को आयनित किया था।
पुनः आयनीकरण हाइड्रोजन को किसी दूसरे तत्व में नहीं बदलता। नाभिक का प्रकार वही रहता है और इलेक्ट्रॉन अलग होता है। यह अगले भाग की नाभिकीय अभिक्रियाओं से अलग है, जिनमें नाभिक खुद बदलते हैं और नए तत्व बनते हैं।
तारों के भीतर और प्रचंड घटनाओं में नए तत्व बनते हैं
कार्बन और ऑक्सीजन शुरू से आज जितनी मात्रा में मौजूद नहीं थे। तारों के गर्म आंतरिक भाग में परमाणु नाभिक आपस में जुड़ते हैं। इस प्रक्रिया को नाभिकीय संलयन कहते हैं। तारे के विकास के दौरान हीलियम नाभिकों की अभिक्रियाओं से कार्बन और ऑक्सीजन बन सकते हैं। कौन-से तत्व कितनी मात्रा में बनेंगे, यह तारे के द्रव्यमान, यानी उसमें मौजूद पदार्थ की मात्रा, और उसके विकास की अवस्था पर निर्भर करता है।
तत्व बनाने का एकमात्र रास्ता संलयन नहीं है। नाभिक न्यूट्रॉन नामक कणों को सोख सकता है और फिर ऐसी अभिक्रियाओं से दूसरे तत्व में बदल सकता है जिनमें नाभिक के अंदर के कण बदलते हैं। न्यूट्रॉन ग्रहण की यह प्रक्रिया बूढ़े तारों के भीतर भी होती है और लोहे से भारी कुछ तत्वों के बनने में योगदान देती है।
दो न्यूट्रॉन तारों के मिलने पर बाहर निकले पदार्थ में भी भारी तत्व बन सकते हैं। न्यूट्रॉन तारा एक छोटा और घना पिंड है, जो किसी भारी तारे के जीवन के अंत में बच सकता है। 2017 में देखी गई न्यूट्रॉन तारों के विलय की घटना के प्रकाश का दोबारा विश्लेषण करने वाले अध्ययन में स्ट्रॉन्शियम नामक तत्व के संकेत मिले। यह अवलोकन इस बात का प्रमाण है कि ऐसे विलय भारी तत्वों के बनने की जगहों में से एक हैं।
तारों से निकला पदार्थ आसपास की गैस में मिलता है
किसी तारे में तत्व बन जाने पर भी वह पदार्थ तुरंत अगले तारे में नहीं पहुँच जाता। पहले उसे तारे से बाहर निकलकर आसपास की गैस में मिलना होता है। जब कोई बूढ़ा तारा अपनी बाहरी परतें खोता है या सुपरनोवा विस्फोट पदार्थ बाहर फेंकता है, तो उसमें मौजूद तत्व भी फैलते हैं। अलग-अलग तारे क्या छोड़ जाते हैं, यह तारों की मृत्यु में समझा जा सकता है।
हबल अंतरिक्ष दूरबीन ने सूर्य जैसे तारों से निकली गैस को केंद्र के गर्म तारे के आसपास देखा है। खगोलविद ऐसे पिंडों के प्रकाश का विश्लेषण करके जाँचते हैं कि निकली हुई गैस में कौन-से तत्व हैं। नए तत्व बनाने वाली नाभिकीय अभिक्रियाएँ और उन्हें अंतरिक्ष में ले जाने वाला पदार्थ का प्रवाह अलग प्रक्रियाएँ हैं।
निकले हुए पदार्थ में वे घटक भी होते हैं जो तारे में शुरू से थे, और वे भी जिन्हें उसने नया बनाया। इसका कुछ हिस्सा ठंडी गैस के बादल में मिलकर फिर इकट्ठा हो जाए, तो बाद के तारों और ग्रह प्रणालियों की सामग्री बन सकता है। कुछ पदार्थ दूर फैल जाता है या तारों के अवशेषों में रह जाता है। इसलिए यह ऐसा बंद चक्र नहीं है जिसमें सारा पदार्थ बिना किसी कमी के वापस लौट आए।
सौर मंडल की सामग्री में पहले के तारों के निशान हैं
सौर मंडल बनाने वाले बादल में भी सूर्य से पहले के तारों द्वारा छोड़े गए घटक मिले हुए थे। कार्बन और ऑक्सीजन जैसे तत्वों से समृद्ध गैस और धूल से सूर्य, ग्रह और छोटे पिंड बने। हाइड्रोजन जैसे कुछ घटक शुरुआती ब्रह्मांड से आए थे। इसलिए हमारे शरीर या पृथ्वी की सारी सामग्री किसी एक सुपरनोवा ने बनाई, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
कुछ उल्कापिंडों में धूल के बहुत छोटे कण बचे होते हैं, जो सूर्य के जन्म से पहले दूसरे तारों के आसपास बने थे। शोधकर्ता इन कणों में परमाणुओं के प्रकार और अनुपात जाँचकर पता लगाते हैं कि उनकी सामग्री किस तरह के तारों से आई होगी। दूर के पिंडों के प्रकाश के साथ-साथ हाथ में लिए जा सकने वाले नमूने भी सूर्य से पहले के इतिहास का सुराग देते हैं।
आज की हमारी आकाशगंगा में भी युवा तारे, पुराने तारे, तारे बनाने वाले बादल और तारों के अवशेष साथ मौजूद हैं। इस लेख में तारों और आकाशगंगाओं का युग ऐसे बदलावों से गुजरते ब्रह्मांड के इतिहास को दर्शाता है। इसका दायरा किसी एक तारे की मुख्य अनुक्रम अवस्था से अलग है, जिसमें वह हाइड्रोजन संलयन से चमकता है। किसी बादल में नया तारा कैसे बनता है, इसे विस्तार से समझने के लिए तारों का जन्म पढ़ा जा सकता है।
स्रोत
- NASA Science — शुरुआती ब्रह्मांड के तत्व और पृष्ठभूमि विकिरण
- NASA Webb — पहले तारों और शुरुआती आकाशगंगाओं पर शोध
- NASA Science — आकाशगंगाओं की सामग्री और विकास
- NASA Science — गैस का आगमन और आकाशगंगाओं का विलय
- NASA Webb — शुरुआती आकाशगंगाओं के आसपास पुनः आयनीकरण के अवलोकन
- NASA Webb — तारों का विकास और कार्बन व ऑक्सीजन का निर्माण
- Liu और सहयोगी — बूढ़े तारों में न्यूट्रॉन ग्रहण और सूर्य से पहले की धूल
- ESO — न्यूट्रॉन तारों के विलय में स्ट्रॉन्शियम पहचानने वाले अवलोकन
- NASA Hubble — तारों से निकली गैस और तत्वों का दोबारा उपयोग