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आकाशगंगा

मिल्की वे

मिल्की वे वह आकाशगंगा है जिसमें हमारा सौरमंडल स्थित है। यह असंख्य तारों, गैस, धूल और डार्क मैटर से बनी, गुरुत्वाकर्षण से बंधी एक छड़ाकार सर्पिल आकाशगंगा है।

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हमें आकाशगंगा के आकार का पता कैसे चला?

आकाशगंगा को ऊपर से दिखाने वाली कोई तस्वीर नहीं है। सौरमंडल गांगेय चक्रिका के भीतर है, इसलिए दूरबीनें हमेशा आकाशगंगा के अंदर से बाहर की ओर देखती हैं। इसी कारण खगोलविद तारों और गैस की दिशा के साथ उनकी दूरी और गति भी मापते हैं। इन मापों को एक ही मानचित्र पर रखने से केंद्र का लंबा दंड और उसके चारों ओर लिपटी सर्पिल भुजाएँ उभरती हैं।

रात के आकाश की दूधिया पट्टी हमारी आकाशगंगा की चक्रिका का भीतर से दिखाई देने वाला रूप है। इसका अंग्रेज़ी नाम Milky Way भी इसी रूप से आया है—मानो आकाश में दूध की राह बनी हो। तारों से भरी चक्रिका को किनारे की ओर लंबी दूरी तक देखने पर अनगिनत तारों का प्रकाश एक-दूसरे पर चढ़कर यह पट्टी बनाता है। लेकिन केवल इस पट्टी से यह नहीं पता चलता कि कौन-सा तारा पास है और कौन-सा दसियों हजार प्रकाश-वर्ष दूर। अंतरतारकीय धूल दूर के तारों को मंद और लाल भी दिखाती है, इसलिए आकाशगंगा का केंद्र और चक्रिका का दूसरा किनारा दृश्य प्रकाश में खास तौर पर कठिन दिखाई देता है।

  • लगभग 26,600 प्रकाश-वर्ष 2019 के अध्ययन में निकाली गई सूर्य से आकाशगंगा के केंद्र तक की दूरी
  • लगभग 200 स्थान भारी तारों के जन्म वाले वे क्षेत्र जिनकी दूरी रेडियो अवलोकनों से सीधे मापी गई
  • 3.3 करोड़ से अधिक Gaia DR3 के वे तारे जिनकी स्थिति और त्रि-आयामी वेग का एक साथ अध्ययन किया जा सकता है
  • दो भुजाएँ और चार भुजाएँ पुराने तारों के वितरण में दो, जबकि गैस और युवा तारों में चार भुजाएँ अधिक साफ दिखती हैं

पास के तारों की दूरी कैसे मापी जाती है?

किसी तारे का धनु तारामंडल की दिशा में दिखना मानचित्र पर एक बिंदु नहीं देता। इससे सूर्य से उस दिशा में जाती एक रेखा मिलती है। आकाशगंगा को ऊपर से देखने वाले निर्देशांक बनाने के लिए यह जानना पड़ता है कि तारा उस रेखा पर कहाँ है। पास के तारों के लिए वार्षिक लंबन मापा जाता है: पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा करने पर तारा दूर की पृष्ठभूमि के सामने थोड़ा खिसका हुआ दिखता है। खिसकाव जितना छोटा हो, तारा उतना ही दूर होता है।

Gaia ने उन्हीं पिंडों को बार-बार देखकर यह बहुत छोटा कोण और आकाश में उनकी गति की दिशा मापी। जारी किए गए DR3 आँकड़ों में 3.3 करोड़ से अधिक तारों की स्थिति और त्रि-आयामी गति का साथ में अध्ययन किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने उनमें से लगभग 5.8 लाख गर्म, युवा तारे और 10 करोड़ वर्ष से कम आयु के 988 तारागुच्छ चुने। इनसे सूर्य से लगभग 13,000 से 16,000 प्रकाश-वर्ष के भीतर तारा-निर्माण क्षेत्रों का मानचित्र बनाया गया। यह हर तारे को ज्यों का त्यों दिखाने वाला मानचित्र नहीं, बल्कि सर्पिल भुजाओं का स्थान बताने के लिए चुने गए युवा तारों का मानचित्र है।

Gaia ने लगभग दो अरब पिंड देखे, पर इसका अर्थ यह नहीं कि सभी दो अरब पिंडों की दूरी और गति समान सटीकता से ज्ञात हैं। उपलब्ध जानकारी और उसकी अनिश्चितता पिंड की चमक और दूरी, आसपास तारों की भीड़ और धूल से होने वाली रुकावट पर निर्भर करती है। अंतरिक्षयान के अवलोकन 2025 में समाप्त हो गए, लेकिन जुटाए गए आँकड़ों को संसाधित और जारी करने का काम अभी जारी है।

धूल के पार मौजूद गैस का पता कैसे लगाया जाता है?

ठंडी हाइड्रोजन गैस की 21 सेंटीमीटर रेडियो तरंग और कार्बन मोनोऑक्साइड अणुओं की रेडियो तरंग दृश्य प्रकाश की तुलना में धूल को बेहतर पार करती हैं। तरंगदैर्घ्य अपने मूल मान से कितना लंबा या छोटा हुआ है, यह मापकर पता चलता है कि गैस हमारी ओर आ रही है या हमसे दूर जा रही है। इसके बाद आकाशगंगा के घूर्णन का मॉडल लगाकर गैस की दूरी का मोटा अनुमान लगाया जा सकता है और गैस की लंबी सघन पट्टियों को संभावित सर्पिल भुजाओं के रूप में खींचा जा सकता है।

फिर भी एक ही वेग कभी-कभी दो अलग दूरियों से मिल सकता है। गैस हमेशा पूर्ण वृत्त में नहीं घूमती; केंद्रीय दंड और सर्पिल भुजाओं का गुरुत्व उसे बगल की ओर भी बहा सकता है। रेडियो अवलोकन आकाशगंगा के दूसरे किनारे की गैस तक पहुँचते हैं, लेकिन घूर्णन वेग से निकली दूरी हमेशा एक ही नहीं होती। इसलिए दूसरी विधियों से सीधे मापी गई दूरियाँ संदर्भ बिंदु के रूप में चाहिए।

रेडियो तरंगें धूल के पीछे छिपी गैस की दिशा और वेग बताती हैं। त्रिकोणमितीय लंबन उस गैस के साथ बन रहे तारों तक की दूरी सीधे मापता है। दोनों मापों को साथ लेने पर ही सर्पिल भुजा का स्थान मानचित्र पर रखा जा सकता है।

क्या बहुत दूर के तारा-निर्माण क्षेत्रों की दूरी भी मापी जा सकती है?

जहाँ भारी तारे बन रहे होते हैं, वहाँ कुछ अणु कभी-कभी एक ही तरंगदैर्घ्य के आसपास बहुत तीव्र रेडियो तरंगें छोड़ते हैं। ऐसा उत्सर्जन करने वाले छोटे क्षेत्र को मेज़र कहते हैं। बहुत दूर-दूर स्थित कई रेडियो दूरबीनों से एक मेज़र को एक साथ देखने पर उसके स्थान में अत्यंत छोटा बदलाव भी मापा जा सकता है। पृथ्वी के सूर्य की एक ओर और फिर दूसरी ओर होने पर दिखने वाले स्थान-अंतर से त्रिकोणमितीय लंबन मिलता है, जिससे आकाशगंगा के घूर्णन मॉडल के बिना दूरी निकाली जा सकती है।

2019 तक BeSSeL और VERA दल ऐसे लगभग 200 भारी तारा-निर्माण क्षेत्रों के लंबन और निज गति इकट्ठे कर चुके थे। बिंदुओं को जोड़ने पर धनु–कैरिना, पर्सियस, स्कूटम–सेंटॉरस और बाहरी भुजा से जुड़ी लंबी पट्टियाँ दिखीं। गैस और तारा-निर्माण की चार मुख्य भुजाओं वाला मॉडल इन आँकड़ों को अच्छी तरह समझाता था। इसी विश्लेषण में सूर्य और आकाशगंगा के केंद्र की दूरी 8.15±0.15 किलोपारसेक, यानी लगभग 26,600 प्रकाश-वर्ष निकली।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर सर्पिल भुजा की पूरी लंबाई बिना किसी खाली हिस्से के माप ली गई है। मेज़र केवल खास तारा-निर्माण क्षेत्रों में चमकीले होते हैं, और दक्षिणी आकाश तथा आकाशगंगा के दूसरे किनारे पर मापन बिंदु कम हैं। शोधकर्ता अलग-अलग बिंदुओं को सर्पिल आकार के गणितीय मॉडल से जोड़ते हैं। इसलिए मानचित्र पर चिकनी दिखने वाली भुजा में सीधे मापे गए हिस्से और मापों के बीच गणना से जोड़े गए हिस्से दोनों हो सकते हैं।

  1. दिशा मापना दर्ज करना कि तारों का प्रकाश या रेडियो तरंग आकाश की किस ओर से आती है।
  2. दूरी मापना Gaia के तारकीय लंबन और मेज़र लंबन से तय करना कि स्रोत उस दिशा में कहाँ है।
  3. गति मापना आकाश में खिसकाव को हमारी ओर आने या हमसे दूर जाने के वेग से जोड़ना।
  4. अलग संकेतकों की तुलना करना पुराने तारे, युवा तारे, तारागुच्छ, हाइड्रोजन और आणविक बादलों को अलग-अलग मानचित्रित करना।
  5. मापन बिंदुओं के बीच गणना करना सीधे न दिखे हिस्से और त्रुटि बताते हुए दंड, भुजाओं और चक्रिका का आकार निकालना।

आकाशगंगा के केंद्र की लंबी पट्टी का पता कैसे चला?

दृश्य प्रकाश में आकाशगंगा के केंद्र के सामने की धूल प्रकाश रोकती है, लेकिन अवरक्त प्रकाश वहाँ के अधिक तारे दिखाता है। खगोलविद वास्तविक चमक में लगभग समान रेड-क्लम्प तारों को चुनते हैं और उनकी दिखाई देने वाली चमक से दूरी का अनुमान लगाते हैं। इन तारों का मानचित्र बताता है कि केंद्र के तारे केवल गोल समूह में नहीं हैं, बल्कि एक ओर झुकी लंबी संरचना बनाते हैं। तारों और गैस की गति भी हर दिशा में एक जैसी गोल चक्रिका से पूरी तरह नहीं समझाई जा सकती।

स्थिति और गति दोनों को समझाने वाले मौजूदा मॉडलों में केंद्रीय दंड सूर्य और आकाशगंगा के केंद्र को जोड़ने वाली रेखा से लगभग 25 से 30 डिग्री झुका है और केंद्र से करीब 16,000 प्रकाश-वर्ष तक फैला है। केंद्र के पास घूमते S2 जैसे तारे की कक्षा केंद्र की स्थिति और दूरी की दूसरी विधि से जाँच करती है। आकाशगंगा को दंडयुक्त सर्पिल आकाशगंगा इसलिए कहा जाता है क्योंकि केंद्रीय तारों, चक्रिका की गैस और सर्पिल भुजाओं के अलग-अलग अवलोकन एक ही संरचना में जुड़ते हैं।

आकाशगंगा की सर्पिल भुजाएँ दो हैं या चार?

Spitzer के अवरक्त अवलोकनों में चक्रिका के पुराने तारों को गिनने पर स्कूटम–सेंटॉरस और पर्सियस भुजाएँ खास तौर पर उभरती हैं। इसके विपरीत हाइड्रोजन, आणविक बादल, युवा तारे और मेज़र तारा-निर्माण की चार लंबी भुजाएँ दिखाते हैं। एक ही आकाशगंगा में पुराने तारों की सबसे घनी जगहें और दबे हुए गैस के वे क्षेत्र, जहाँ नए तारे बन रहे हैं, बिल्कुल एक ही रेखा पर होना आवश्यक नहीं है।

सूर्य वाले क्षेत्र को पहले मुख्यतः छोटी “ओरायन शाखा” के रूप में दिखाया जाता था। मेज़र और Gaia से युवा तारों के बने मानचित्र अब स्थानीय भुजा को कम से कम लगभग 26,000 प्रकाश-वर्ष लंबा भाग दिखाते हैं। “भुजा” और “शाखा” को अलग करने वाली कोई आधिकारिक सीमा नहीं है। नाम लंबाई, तारा-निर्माण की मात्रा और दूसरी भुजाओं से दिखने वाले संबंध पर निर्भर करते हैं, इसलिए अलग अध्ययन भुजाओं की संख्या और सीमाएँ थोड़ी अलग बना सकते हैं।

आकाशगंगा के मानचित्र का कितना हिस्सा सीधे मापा गया है?

आकाशगंगा से बाहर निकले बिना भी हम उसके दंड, चक्रिका और सर्पिल संरचना को पहचान सकते हैं। लेकिन यह ज्ञान किसी एक दूरबीन या एक चित्र से नहीं आता। तारकीय लंबन पास की चक्रिका को विस्तार से भरता है, रेडियो तरंगें धूल के पीछे की गैस खोजती हैं, मेज़र लंबन दूर की भुजाओं में दूरी के आधार बिंदु रखते हैं, और अवरक्त अवलोकन तथा तारों की गतियाँ केंद्रीय दंड दिखाती हैं।

नए आँकड़े आने पर भुजाएँ कैसे जुड़ती हैं, दंड कितना लंबा है, या स्थानीय भुजा को भुजा कहा जाए या शाखा—इन बातों में बदलाव आ सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पुराने मानचित्र बिना प्रमाण के बनाए गए थे। यह बताने पर कि किन तारों और गैस का उपयोग हुआ और किन हिस्सों की दूरी सीधे मापी गई, हम आकाशगंगा के मानचित्र में पुष्टि किए गए भागों और गणना से जोड़े गए भागों को अलग कर सकते हैं।

स्रोत

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संबंध

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