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धूमकेतु

धूमकेतु

धूमकेतु वह छोटा पिंड है जिसका बर्फ़, धूल और चट्टान से बना नाभिक सूर्य के पास पहुँचने पर बर्फ़ के ऊर्ध्वपातन से गैस और धूल छोड़ता है। नाभिक के चारों ओर चमकीला कोमा बनता है, जबकि सौर विकिरण दबाव और सौर पवन धूल तथा आयन पूँछों को अलग दिशाओं और आकारों में फैलाते हैं। यह पृष्ठ किसी एक धूमकेतु के बजाय उनकी संरचना, गतिविधि और कक्षा के साथ बदलते रूप को समझाता है।

धूमकेतु क्या है?

धूमकेतु बर्फ़, धूल और चट्टान से बना सूर्य की परिक्रमा करने वाला छोटा खगोलीय पिंड है। सूर्य से दूर होने पर केवल उसका अँधेरा, जमा हुआ नाभिक दिखाई देता है, इसलिए वह क्षुद्रग्रह जैसा लग सकता है। सूर्य के पास आने और गर्म होने पर नाभिक की बर्फ़ ऊर्ध्वपातित होने लगती है—वह तरल बने बिना सीधे गैस में बदलती है। बाहर निकलती गैस धूल को साथ उठाकर नाभिक के चारों ओर फैला हुआ कोमा बनाती है; फिर सूर्य का प्रकाश और सौर पवन इस पदार्थ को बाहर की ओर धकेलकर पूँछें बनाते हैं।

इसलिए पूँछ धूमकेतु का स्थायी हिस्सा नहीं है। वही धूमकेतु सूर्य से दूर जाते हुए कम सक्रिय हो सकता है और फिर केवल उसका नाभिक दिखाई दे सकता है। “धूमकेतु” का अर्थ केवल 67P या हैली जैसे किसी एक पिंड से नहीं, बल्कि उन पिंडों की श्रेणी से है जिनके बर्फ़-समृद्ध नाभिक सौर ताप से सक्रिय हो सकते हैं।

  • नाभिक बर्फ़, धूल, चट्टान और कार्बनिक पदार्थ से बना ठोस केंद्र
  • कोमा ऊर्ध्वपातित गैस और धूल से नाभिक के चारों ओर बना अस्थायी वायुमंडल
  • दो पूँछें मुड़ी हुई धूल की पूँछ और सूर्य से विपरीत दिशा में आयन पूँछ
  • 200 वर्ष अल्प-अवधि और दीर्घ-अवधि धूमकेतुओं को बाँटने के लिए सामान्य कक्षीय अवधि सीमा

धूमकेतु के नाभिक, कोमा और पूँछों में क्या अंतर है?

नाभिक वह ठोस भाग है जिसमें धूमकेतु का अधिकांश द्रव्यमान होता है। उसका आकार सामान्यतः कुछ किलोमीटर होता है, हालाँकि कुछ इससे छोटे और कुछ बहुत बड़े भी हैं। उसकी सतह प्रायः चमकीले बर्फ़ के गोले जैसी नहीं दिखती। जो धूमकेतु कई बार सूर्य के पास से गुजरे हैं, उनकी बर्फ़ निकल जाने के बाद बची अँधेरी धूल और कार्बनिक सामग्री सतह को ढक सकती है। बर्फ़ उसके नीचे छिपी रह सकती है या हाल में ढही चट्टानों और दरारों में खुल सकती है।

कोमा नाभिक से निकले अणुओं और धूल का विशाल बादल है। सूर्य के पास यह नाभिक से हज़ारों गुना बड़ा हो सकता है, इसलिए दूरबीन में दिखने वाला चमकीला, धुँधला सिर मुख्यतः कोमा होता है, नाभिक नहीं। पराबैंगनी प्रकाश और सौर पवन कोमा के अणुओं को आयनित करते हैं, जबकि धूल सूर्य का प्रकाश परावर्तित करती है। अलग-अलग तरंगदैर्घ्यों पर कोमा और पूँछों के प्रकाश का विश्लेषण करके नाभिक से निकल रहे पदार्थों का पता लगाया जा सकता है।

धूमकेतु की पूँछ हमेशा उसकी गति के पीछे क्यों नहीं रहती?

धूल की पूँछ सूक्ष्म धूल कणों पर सूर्य के प्रकाश के दबाव से बनती है। कणों के आकार और गति में अंतर उन्हें धूमकेतु की कक्षा के साथ चौड़ी और धीरे मुड़ी हुई पूँछ में फैला देता है। यह अक्सर सफ़ेद या पीली दिखाई देती है, और कण धूमकेतु के गुजर चुके रास्ते के पास लंबे समय तक बने रह सकते हैं।

आयन पूँछ तब बनती है जब विद्युत आवेशित गैस सौर पवन और सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र के प्रभाव में बह जाती है। यह सामान्यतः अधिक सीधी और नीली होती है तथा लगभग ठीक सूर्य की विपरीत दिशा में रहती है। सूर्य का चक्कर काटकर बाहर की ओर जाते समय धूमकेतु की पूँछ कभी-कभी उसकी गति के आगे दिखाई दे सकती है। कारण यह है कि पूँछ की दिशा यात्रा-पथ के पीछे से नहीं, सूर्य के सापेक्ष दिशा से तय होती है।

धूमकेतु की पूँछें उसकी गति के निशान नहीं, सूर्य के साथ उसकी अंतःक्रिया का अभिलेख हैं। धूमकेतु दिशा बदले तब भी दोनों पूँछें सामान्यतः सूर्य से दूर फैलती रहती हैं।

अल्प-अवधि और दीर्घ-अवधि धूमकेतु कहाँ से आते हैं?

200 वर्ष से कम कक्षीय अवधि वाले धूमकेतु को सामान्यतः अल्प-अवधि धूमकेतु कहा जाता है। माना जाता है कि इनमें से कई नेपच्यून से बाहर काइपर पट्टी या प्रकीर्णित चक्र के बर्फ़ीले पिंड थे, जिन्हें विशाल ग्रहों के गुरुत्व ने भीतर की ओर मोड़ दिया। बृहस्पति पास आए धूमकेतु की कक्षा को बहुत बदल सकता है, इसलिए 67P जैसे कम अवधि वाले और उससे प्रबल रूप से प्रभावित पिंड बृहस्पति-परिवार के धूमकेतु कहलाते हैं।

दीर्घ-अवधि धूमकेतु सैकड़ों से लाखों वर्षों की कक्षाओं पर चलते हैं और कई दिशाओं से भीतरी सौर मंडल में आते हैं। इस वितरण को समझाने के लिए सौर मंडल के सबसे बाहरी भाग में लगभग गोलाकार बर्फ़ीले पिंडों के भंडार—ऊर्ट बादल—का अनुमान लगाया जाता है। गुजरते तारों और आकाशगंगा का गुरुत्व वहाँ की कक्षाओं को थोड़ा बदलकर कुछ पिंडों को सूर्य की ओर भेज सकता है। इतनी दूरी पर ऊर्ट बादल के पिंडों की सीधी तस्वीर लेकर सूची नहीं बनाई गई है, इसलिए उसकी संरचना और विस्तार धूमकेतुओं की कक्षाओं और निर्माण मॉडलों से अनुमानित हैं।

क्या धूमकेतु वास्तव में “गंदी बर्फ़ की गेंद” है?

भागमुख्य पदार्थ और अवस्थाअवलोकन में सावधानी
नाभिक की सतहअँधेरी धूल, खनिज और कार्बनिक पदार्थ की परतअँधेरी सतह का अर्थ यह नहीं कि भीतर बर्फ़ नहीं है।
नाभिक का अंदरूनी भागपानी, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य यौगिकों की बर्फ़, धूल और रिक्त स्थानअनुपात और परतें हर धूमकेतु में अलग हैं और सभी मान सीधे ड्रिलिंग से नहीं मिले हैं।
कोमानाभिक से निकली गैस, धूल और कार्बनिक अणुसंरचना सूर्य से दूरी, घूर्णन और ऋतु के साथ बदल सकती है।
पूँछेंअलग आकार के धूल कण और आयनित गैसपूँछ की लंबाई सीधे नाभिक का आकार या कुल द्रव्यमान नहीं बताती।

फ़्रेड व्हिपल का “गंदी बर्फ़ की गेंद” मॉडल इस मुख्य विचार को सही समझाता था कि बर्फ़ और धूल वाला नाभिक सूर्य से गर्म होकर सक्रिय होता है। लेकिन अंतरिक्ष यानों के अवलोकनों ने दिखाया कि धूमकेतु एकसमान ठोस बर्फ़ की गेंदों से कहीं अधिक जटिल हैं। उनका नाभिक अत्यंत अँधेरा और छिद्रयुक्त हो सकता है, जिसमें ढीले जुड़े बर्फ़-धूल के ढेले और परतें, टूटी चट्टानें और गैस निकलने के छिद्र होते हैं।

रोसेटा ने धूमकेतुओं के बारे में हमारी समझ कैसे बदली?

ESA का रोसेटा अंतरिक्ष यान 2014 से 2016 तक 67P/चुर्युमोव–गेरासिमेंको के साथ रहा और सूर्य के पास आने तथा फिर दूर जाने की प्रक्रिया देखता रहा। उसका फ़िलाए लैंडर नाभिक की सतह तक पहुँचा। 67P का नाभिक दो जुड़े हुए खंडों से बना है और उसका औसत घनत्व पानी से बहुत कम है, जिससे भीतर बहुत खाली जगह वाली छिद्रयुक्त संरचना का पता चलता है।

रोसेटा ने पाया कि सतह का अधिकांश भाग अँधेरा और सूखा दिखने के बावजूद नीचे पानी की बर्फ़ थी। रोशनी पड़ने की जगह और घूर्णन के अनुसार बर्फ़ ऊर्ध्वपातित होकर फिर जमती थी। मिशन ने पानी, कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड और कई कार्बनिक अणु भी पाए। इससे स्पष्ट होता है कि धूमकेतु केवल पानी की बर्फ़ का खंड नहीं, बल्कि ताप, गैस प्रवाह, धूल की गति और चट्टानों के ढहने से लगातार बदलने वाला पिंड है।

सूर्य की हर परिक्रमा में धूमकेतु कैसे बदलता है?

सूर्य के हर निकट आगमन पर धूमकेतु वाष्पशील बर्फ़ और धूल खोता है, इसलिए उसकी सतह, घूर्णन और कक्षा धीरे-धीरे बदल सकते हैं। अलग-अलग छिद्रों से निकलने वाले जेट छोटे रॉकेट की तरह नाभिक को धक्का देते हैं, जबकि तापीय तनाव और तेज़ घूर्णन दरार या विखंडन पैदा कर सकते हैं। सूर्य के बहुत पास से गुजरने वाला धूमकेतु पूरी तरह टूट या वाष्पित हो सकता है।

पृथ्वी जब धूमकेतु की छोड़ी धूल-पट्टी से गुजरती है, तो कण वायुमंडल में चमककर उल्का-वर्षा बनाते हैं। दूसरी ओर, अधिकांश बर्फ़ खोकर निष्क्रिय हुआ नाभिक अँधेरे क्षुद्रग्रह जैसा दिख सकता है। क्षुद्रग्रह और धूमकेतु के बीच की सीमा केवल एक पदार्थ के नाम से कहीं कम स्पष्ट है; व्यावहारिक वर्गीकरण में कक्षा, गतिविधि, वर्णक्रम और गैस की पहचान को साथ देखा जाता है।

क्या धूमकेतु आरंभिक पृथ्वी पर पानी और जीवन लाए थे?

धूमकेतु लगभग 4.6 अरब वर्ष पहले सूर्य और ग्रहों के निर्माण से बची सामग्री सुरक्षित रखते हैं, जिससे आरंभिक सौर मंडल के तापमान और रसायन का अध्ययन किया जा सकता है। NASA का स्टारडस्ट मिशन वाइल्ड 2 धूमकेतु की धूल पृथ्वी पर लाया, और नमूनों में अंतरिक्ष मूल की ग्लाइसिन तथा उच्च तापमान पर बने खनिज मिले। इससे पता चलता है कि धूमकेतु सामग्री ठंडे बाहरी सौर मंडल में अलग-थलग नहीं रही, बल्कि निर्माण के समय बड़े पैमाने पर पदार्थ-मिश्रण का अभिलेख रखती है।

फिर भी धूमकेतुओं को पूरी तरह अपरिवर्तित समय-कैप्सूल नहीं मानना चाहिए। सूर्य के पास कई बार से गुजरे पिंड गर्मी और क्षरण सह चुके हैं, और अलग धूमकेतुओं में पानी व कार्बनिक पदार्थ का अनुपात अलग है। 67P के पानी का हाइड्रोजन समस्थानिक अनुपात पृथ्वी के महासागरों से भिन्न है। धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों ने युवा पृथ्वी तक पानी और कार्बनिक पदार्थ पहुँचाए हों, यह संभव है; लेकिन इसका अर्थ न तो यह है कि महासागरों का अधिकांश पानी किसी एक धूमकेतु समूह से आया, न ही कार्बनिक अणु मिलना जीवन मिलने के बराबर है।

धूमकेतु अनुसंधान में कौन-से प्रश्न अभी बाकी हैं?

अब तक पास से जाँचे गए अधिकांश धूमकेतु अल्प-अवधि वाले हैं जो सूर्य के पास कई बार आ चुके हैं। इसलिए ऊर्ट बादल से पहली बार आने वाले दीर्घ-अवधि धूमकेतु कितने अलग हैं, नाभिक के भीतर बर्फ़ और रिक्त स्थान कैसे व्यवस्थित हैं, और कौन-से पदार्थ विस्फोटक गतिविधि शुरू या बंद करते हैं—इनकी पर्याप्त तुलना नहीं हुई है। ESA का कॉमेट इंटरसेप्टर ऐसे धूमकेतु या अंतरतारकीय पिंड को कई दिशाओं से देखने की तैयारी में है जो भीतरी सौर मंडल में शायद ही कभी आया हो, ताकि इन अंतरों का अध्ययन किया जा सके।

धूमकेतु सौर मंडल के निर्माण का अभिलेख भी है और आज भी बदलता हुआ पिंड भी। नाभिक, कोमा और दोनों पूँछों को अलग पहचानकर, तथा हर अवलोकन का समय और सूर्य से दूरी साथ देखकर, हम उसके प्राचीन इतिहास और वर्तमान गतिविधि दोनों को ठीक से पढ़ सकते हैं।

स्रोत

संबंध

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