रबड़ के बत्तख जैसे धूमकेतु के साथ दो वर्ष
67P/चुर्युमोव–गेरासिमेंको केवल दूरबीन में क्षणभर दिखा प्रकाश-बिंदु नहीं था; यह पहला धूमकेतु था जिसके साथ किसी अंतरिक्षयान ने सूर्य की परिक्रमा की और बदलते मौसमों को देखा। रोसेटा और फिले ने पास से दर्ज किया कि बर्फ और धूल का छोटा नाभिक सूर्यप्रकाश पाकर कोमा और पूँछें बनाता है, चट्टानी दीवारें गिराता है और प्राचीन सामग्री अंतरिक्ष में छोड़ता है।
- परिक्रमण काल
लगभग 6.45 वर्ष - घूर्णन काल
लगभग 12.4 घंटे - द्रव्यमान
लगभग 10 अरब टन - औसत घनत्व
लगभग 533 kg/m³
दो जुड़े पिंडों से बना छोटा संसार
67P का नाभिक गोल बर्फीला गोला नहीं है। बड़े खंड का आकार लगभग 4.1 × 3.3 × 1.8 km और छोटे का लगभग 2.6 × 2.3 × 1.8 km है; दोनों को एक संकरी “गर्दन” जोड़ती है। रबड़ के बत्तख से तुलना की जाने वाली यह आकृति इस व्याख्या से मेल खाती है कि दो छोटे पिंड धीमी टक्कर में जुड़ गए, हालांकि निर्माण और विकास की बारीकियाँ अभी भी शोध का विषय हैं।
रोसेटा के रेडियो-विज्ञान प्रयोग और त्रि-आयामी आकार मॉडलों से घनत्व लगभग 533 kg/m³ निकला—पानी के घनत्व के आधे से थोड़ा अधिक। कारण यह नहीं कि बर्फ और धूल की सामग्री असामान्य रूप से हल्की है, बल्कि यह कि सूक्ष्म रिक्त स्थान अंदरूनी आयतन का लगभग 70–80% घेरते हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि नाभिक में एक विशाल गुफा खाली पड़ी है; गुरुत्वीय माप बड़े आंतरिक खोखलों के बिना अपेक्षाकृत समान छिद्रयुक्त संरचना का समर्थन करते हैं।
बृहस्पति ने कक्षा बदली, सूर्य सतह को जगाता है
67P बृहस्पति-परिवार का धूमकेतु है। बृहस्पति से बार-बार निकट भेंट, विशेषकर 1840 और 1959 के गुरुत्वीय विक्षोभ, इसकी कक्षा को भीतर ले आए; अब यह लगभग 6.45 वर्ष में सूर्य का चक्कर लगाता है। इसका अपसौर बृहस्पति की कक्षा के पास और उससे बाहर है, जबकि उपसौर लगभग 1.3 AU पर पृथ्वी और मंगल की कक्षाओं के बीच पड़ता है।
सूर्य से दूर होने पर नाभिक अँधेरा और कम सक्रिय रहता है। पास आने पर सूर्यप्रकाश सतह और उथली भूमिगत बर्फ को गर्म करता है; बर्फ तरल बने बिना सीधे गैस में उर्ध्वपातित हो जाती है। निकलती गैस धूल को साथ ले जाकर नाभिक के चारों ओर कोमा बनाती है। सौर विकिरण दाब धूल को चौड़ी, मुड़ी हुई पूँछ में धकेलता है, जबकि सौर पवन आयनित गैस को चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में ले जाकर लगभग सीधी आयन पूँछ बनाती है। सतह से निकलने वाले जेट स्थानीय विस्फोट हैं जो इन दो विशाल पूँछों को सामग्री देते हैं; वे स्वयं पूँछ नहीं हैं।
67P की आकृति और झुका घूर्णन-अक्ष सूर्यप्रकाश को समान रूप से नहीं बाँटते। उत्तरी गोलार्ध दूर रहते समय कमजोर धूप वाला लंबा ग्रीष्म झेलता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध उपसौर के पास छोटा और तीव्र ग्रीष्म अनुभव करता है। रोसेटा ने ऐसे जेट देखे जो स्रोत क्षेत्र पर धूप पड़ने के साथ नियमित रूप से चालू होते थे, और चट्टान ढहने या नई बर्फ खुलने से हुए अचानक विस्फोट भी दर्ज किए।
रोसेटा को कोई अपरिवर्तित “जमा हुआ जीवाश्म” नहीं मिला। उसे ऐसा सक्रिय संसार मिला जो प्राचीन सामग्री सँभालता है, फिर भी सूर्य के हर निकट आगमन पर दरार, क्षरण और ढहने से नई सतह बनाता है।
दस वर्ष की पीछा-यात्रा और तीन स्पर्श
- 1969 — क्लिम चुर्युमोव ने स्वेतलाना गेरासिमेंको द्वारा ली गई फोटोग्राफिक प्लेटों पर एक नया धूमकेतु पहचाना।
- 2 मार्च 2004 — ESA ने रोसेटा प्रक्षेपित किया। पृथ्वी से तीन और मंगल से एक गुरुत्वीय सहायता लेकर उसने लक्ष्य का पीछा किया।
- 6 अगस्त 2014 — दस वर्ष और लगभग 6.4 अरब km की यात्रा के बाद रोसेटा 67P पहुँचा और धूमकेतु से मिलन करने वाला पहला अंतरिक्षयान बना।
- 12 नवंबर 2014 — फिले लैंडर अलग होकर सतह पर पहुँचा। उसके स्थिरकारी हारपून और स्क्रू ठीक से नहीं चले, इसलिए वह उछला, तीन बार सतह से टकराया और छायादार एबिडोस स्थल पर रुक गया।
- 13 अगस्त 2015 — धूमकेतु उपसौर से गुज़रा। रोसेटा ने सक्रियता को चरम तक बढ़ते और फिर घटते हुए लगातार देखा।
- 30 सितंबर 2016 — नाभिक की ओर नियंत्रित अवरोह के दौरान अंतिम डेटा भेजते हुए रोसेटा ने अपना मिशन पूरा किया।
फिले का अवतरण ऐसी सफलता नहीं था जिसमें सब कुछ योजना के अनुसार हुआ। स्थिरकारी उपकरण विफल होने से वह पहले स्पर्श-बिंदु से 1 km से अधिक चला गया और कम धूप वाली जगह रुका। फिर भी बैटरी समाप्त होने से पहले उसने कई प्रयोग किए और सतह व अंदरूनी भाग के गुण मापे। यह अनपेक्षित यात्रा भी अलग-अलग स्थानों की मजबूती और संरचना की तुलना का डेटा बन गई।
सूर्य के पास बदला भू-दृश्य
रोसेटा की पहले और बाद की छवियों में बढ़ती दरारें, ढही चट्टानी दीवारें, खिसके शिलाखंड, नई खुली बर्फ और दूसरी जगह जमा धूल दिखाई दी। कुछ धूल-जेटों का स्रोत गोल गड्ढों या चट्टानों तक खोजा गया। 2015 के उपसौर के आसपास सामान्य जेटों से कहीं अधिक चमकीले और कुछ ही दसियों मिनट में समाप्त होने वाले विस्फोट भी पकड़े गए। इससे पता चलता है कि सक्रियता केवल सूर्यप्रकाश की तीव्रता के अनुपात में नहीं चलती; भू-आकृति, मौसम, तापीय तनाव और ढहना मिलकर उसका स्थान और शक्ति तय करते हैं।
ऑक्सीजन, कार्बनिक पदार्थ और पानी की बहस
रोसेटा के द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटरों ने कोमा में आणविक ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के साथ अमीनो अम्ल ग्लाइसिन तथा फॉस्फोरस भी पहचाने। ये पदार्थ प्रारंभिक सौरमंडल के अत्यंत ठंडे वातावरण और रसायन को समझने के संकेत हैं। पर जीवन से जुड़ी सामग्री का मिलना जीवन की खोज नहीं है, न ही यह सिद्ध करता है कि 67P पृथ्वी पर जीवन का प्रत्यक्ष स्रोत था।
पानी की उत्पत्ति की व्याख्या दिखाती है कि डेटा की दोबारा जाँच से वैज्ञानिक निष्कर्ष कैसे बदलते हैं। 2014 के प्रारंभिक रोसेटा विश्लेषण ने बताया कि 67P के पानी में ड्यूटेरियम-हाइड्रोजन अनुपात पृथ्वी के महासागरों से तीन गुना से अधिक था, जिससे यह संभावना बढ़ी कि ऐसे धूमकेतु पृथ्वी के पानी के मुख्य स्रोत नहीं थे। लेकिन 2024 में पूरे मिशन डेटा के पुनर्विश्लेषण ने सुझाया कि नाभिक के पास बर्फ-लेपित धूल अनुपात को अधिक दिखा सकती है, जबकि धूल के कम प्रभाव वाले बाहरी कोमा के मान पृथ्वी के पानी के निकट थे।
नया परिणाम फिर से यह संभावना खोलता है कि 67P जैसे बृहस्पति-परिवार के धूमकेतु प्रारंभिक पृथ्वी तक पानी लाए, लेकिन वह योगदान का अनुपात निश्चित नहीं करता। मुख्य बात यह है कि नमूना कहाँ से आया और आसपास की धूल ने माप को कैसे बदला—यह समझने पर वही मिशन डेटा अधिक सटीक कहानी बताता है।
67P से हमने क्या सीखा?
| प्रेक्षण | क्या पता चला | शेष प्रश्न |
|---|---|---|
| गुरुत्व क्षेत्र और आकृति | कम घनत्व और अत्यधिक छिद्रयुक्त, पर बड़े खोखलों के बिना नाभिक | दोनों खंड ठीक कब और किस गति से जुड़े? |
| जेट और सतही परिवर्तन | उर्ध्वपातन, मौसम और ढहना सक्रियता का स्थान व शक्ति बदलते हैं | एक उपसौर यात्रा में कितनी अंदरूनी सामग्री स्थानांतरित होती है? |
| गैस और धूल की संरचना | प्रारंभिक सौरमंडल का ठंडा निर्माण वातावरण और जटिल रसायन | धूमकेतुओं और क्षुद्रग्रहों ने पृथ्वी के पानी व कार्बनिक पदार्थों में कितना-कितना योगदान दिया? |
नाभिक के आकार उसके अनियमित दोनों खंडों के अक्षों के अनुसार दिए गए हैं; उन्हें एक “व्यास” में बदलने पर देखने की दिशा के साथ मान बदलता है। घनत्व और आंतरिक छिद्रता भी आकार तथा गुरुत्व मॉडलों पर आधारित अनुमान हैं।