चंद्रमा के धब्बे और गड्ढे हमें क्या बताते हैं?
चंद्रमा पर दिखने वाले हल्के और गहरे हिस्से तथा उसके असंख्य टक्कर-गड्ढे केवल सतही निशान नहीं हैं। हल्के क्षेत्रों में चंद्रमा की प्राचीन भूपर्पटी बची हुई है, जबकि गहरे क्षेत्रों में उन विशाल टक्करों के बाद बहा लावा मौजूद है। चंद्रमा पर बारिश, हवा और प्लेटों की सक्रिय हलचल लगभग न होने के कारण ये निशान आसानी से मिटते नहीं हैं, इसलिए हम आज भी बहुत पुराने समय की घटनाएँ पढ़ सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि चंद्रमा पूरी तरह रुकी हुई दुनिया है। अंतरिक्ष की छोटी चट्टानें अब भी उसकी सतह से टकराती हैं और भीतर का भाग ठंडा होकर सिकुड़ता है, जिससे चंद्रकंप भी आते हैं। एक ही सतह पर प्राचीन निशानों और आज के छोटे बदलावों का साथ-साथ होना चंद्रमा को एक विशेष अभिलेख बनाता है।
चंद्रमा हमें लगभग हमेशा एक ही चेहरा क्यों दिखाता है?
चंद्रमा लगभग 27 दिनों में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करता है और लगभग उतने ही समय में पृथ्वी की एक परिक्रमा भी करता है। दोनों अवधियाँ समान होने के कारण उसका एक गोलार्ध लगातार पृथ्वी की ओर रहता है। इस स्थिति को ज्वारीय बंधन कहा जाता है। हमें एक ही चेहरा इसलिए नहीं दिखता कि चंद्रमा घूमता ही नहीं है।
पृथ्वी से न दिखने वाले चंद्रमा के दूर वाले हिस्से पर भी सूर्य का प्रकाश पड़ता है और वहाँ दिन तथा रात होते हैं। उसे “अंधेरा हिस्सा” कहना उसकी वास्तविक रोशनी का वर्णन नहीं है। सोवियत अंतरिक्ष यान Luna 3 ने 1959 में पहली बार उस हिस्से की तस्वीर ली थी। उसके बाद कई परिक्रमा यानों ने दूर वाले हिस्से का विस्तृत नक्शा बनाया, जहाँ सामने वाले हिस्से की तुलना में अधिक गड्ढे और मोटी भूपर्पटी है।
- लगभग 384,400 किमी पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की औसत दूरी
- लगभग 27 दिन चंद्रमा की घूर्णन अवधि और पृथ्वी की परिक्रमा की अवधि
- पृथ्वी का लगभग 1/6 चंद्र सतह पर महसूस होने वाला गुरुत्वाकर्षण
- 382 किग्रा अपोलो अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा लाए गए चंद्र पत्थर और मिट्टी
हल्के और गहरे क्षेत्र अलग क्यों हैं?
सबसे अधिक स्वीकार किया गया वर्णन यह है कि लगभग 4.5 अरब वर्ष पहले युवा पृथ्वी से एक बड़ा पिंड टकराया और बाहर निकले पदार्थ से चंद्रमा बना। नया चंद्रमा अधिकतर पिघला हुआ था। ठंडा होते समय हल्के रंग वाले कम घनत्व के खनिज ऊपर तैर आए और पहली भूपर्पटी बनी। आज गड्ढों से भरे चमकीले ऊँचे भूभाग उसी प्राचीन भूपर्पटी के निशान हैं। टक्कर की ठीक-ठीक प्रक्रिया पर नमूनों और मॉडलों की मदद से अब भी शोध चल रहा है।
बाद में विशाल टक्करों ने चौड़े और निचले बेसिन बनाए। चंद्रमा के भीतर से गहरा बेसाल्टिक लावा ऊपर आया, कुछ बेसिनों में भर गया और जमकर मैदान बन गया। पुराने पर्यवेक्षकों को ये गहरे क्षेत्र पानी भरे स्थानों जैसे लगे, इसलिए उन्होंने इन्हें “समुद्र” कहा। लेकिन चंद्रमा के समुद्र पानी नहीं, जमा हुआ लावा हैं।
चंद्र सतह पुरानी इसलिए नहीं है कि वहाँ कभी कुछ हुआ ही नहीं, बल्कि इसलिए कि अनेक घटनाओं के निशान मिटाने वाली बारिश और हवा लगभग नहीं थीं।
वैज्ञानिक चंद्रमा का समय कैसे पढ़ते हैं?
आमतौर पर जिस भूभाग पर अधिक टक्कर-गड्ढे होते हैं वह अधिक पुराना होता है, जबकि कम गड्ढों वाले लावा मैदान पर सतह बाद में दोबारा बिछी होती है। फिर भी केवल तस्वीरों से सटीक आयु पता नहीं चलती। अपोलो के छह अवतरण अभियानों ने 2,196 नमूने, यानी कुल 382 किग्रा पत्थर और मिट्टी, पृथ्वी पर पहुँचाए। प्रयोगशाला में इनकी आयु मापने से वैज्ञानिक तस्वीरों में दिखते भूभागों को संख्याओं में व्यक्त वास्तविक आयु से जोड़ सके।
इन नमूनों का आज भी नए उपकरणों से विश्लेषण किया जाता है। लेकिन सभी नमूने चंद्रमा के सामने वाले हिस्से में भूमध्य रेखा के पास स्थित छह स्थानों से आए हैं, इसलिए वे पूरे चंद्रमा का समान रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते। दूर वाले हिस्से और ध्रुवीय क्षेत्रों से मिलने वाले नए नमूने मौजूदा समयरेखा को अधिक सटीक बना सकते हैं या उसके कुछ भाग बदल सकते हैं।
- दूरबीनें और तस्वीरें चमकीले ऊँचे भूभाग, गहरे मैदान और गड्ढों के फैलाव की तुलना करती हैं।
- अपोलो के नमूने चट्टानों की बनावट और आयु बताते हैं तथा तस्वीरों में दिखते भूभागों को वास्तविक तारीख देते हैं।
- अपोलो के भूकंपमापी आँखों से न दिखने वाले चंद्रमा के भीतर और कई प्रकार के चंद्रकंप दर्ज कर चुके हैं।
- LRO परिक्रमा यान 2009 से भूभाग, तापमान और संघटन को बार-बार माप रहा है और पुराने नक्शों को आज दिखते बदलावों से जोड़ता है।
चंद्रमा पर पानी कहाँ और किस रूप में मौजूद है?
चंद्रमा पर महासागर या नदियाँ नहीं हैं, लेकिन वहाँ पानी बिल्कुल नहीं है, यह भी सही नहीं है। उपकरणों ने धूप पड़ने वाले मिट्टी के कणों के भीतर या उनकी सतह से चिपके पानी के अणुओं की बहुत छोटी मात्रा दर्ज की है। चंद्रमा के ध्रुवों के पास कुछ गहरे गड्ढों में लंबे समय तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता। इन बेहद ठंडे स्थायी छाया वाले क्षेत्रों में पानी की बर्फ की पुष्टि भी हुई है।
इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे चंद्रमा पर बहुत पानी है। पानी अलग-अलग स्थानों और रूपों में बहुत विरल रूप से फैला है। बर्फ कितनी गहराई में दबी है और वास्तव में उसका कितना भाग उपयोग किया जा सकता है, इसकी जाँच अभी जारी है। इसलिए “चंद्रमा पर पानी है” को इस जानकारी के साथ समझना चाहिए कि पानी कहाँ और किस तरीके से मिला।
धूप वाले क्षेत्रों में मिले विरल पानी के अणु और ध्रुवों की ठंडी छाया में जमा पानी की बर्फ एक जैसे वातावरण में नहीं हैं। दोनों अवलोकनों को जोड़कर झीलों या बर्फ की चौड़ी चादरों की कल्पना नहीं करनी चाहिए।
क्या चंद्रमा आज भी बदल रहा है?
चंद्रमा का भीतरी भाग बहुत लंबे समय से ठंडा होकर थोड़ा-थोड़ा सिकुड़ता रहा है। भूपर्पटी के लिए जगह कम होने पर ऐसे भ्रंश बने जहाँ जमीन का एक हिस्सा दूसरे के ऊपर धकेला गया और नीची खड़ी ढलानें बनीं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पिछले कई सौ मिलियन वर्षों में चंद्रमा का व्यास लगभग 50 मीटर घटा है, और वे मानते हैं कि उसका धीमा सिकुड़ना आज भी जारी हो सकता है।
सभी चंद्रकंपों का कारण एक जैसा नहीं होता। पृथ्वी का गुरुत्व चंद्रमा के भीतर खिंचाव पैदा कर सकता है, दिन और रात के बीच तापमान का बड़ा अंतर सतही चट्टानों को फैलाता और सिकोड़ता है, और उल्कापिंड की टक्कर भी कंपन पैदा करती है। भीतर के ठंडा होने और सिकुड़ने के बाद कोई भ्रंश अचानक खिसके तो उथला चंद्रकंप भी आ सकता है। चंद्रमा की तस्वीर में पुराने टक्कर-गड्ढों और अपेक्षाकृत नए भ्रंशों को साथ देखने पर पता चलता है कि चंद्रमा अपने अतीत को सँभालते हुए बहुत धीमी गति से नए निशान भी जोड़ रहा है।
