पृथ्वी के लगभग बराबर आकार वाला शुक्र सबसे गर्म ग्रह कैसे बना?
शुक्र सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है, लेकिन केवल इसलिए नहीं कि वह सूर्य के अधिक पास है। उसका घना कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल सतह से निकलने वाली गर्मी को आसानी से अंतरिक्ष में जाने नहीं देता। शुक्र का आकार और आंतरिक बनावट पृथ्वी से मिलते-जुलते हैं, फिर भी आज उसकी सतह का तापमान लगभग 467°C है और वायुदाब पृथ्वी के समुद्र तल के दबाव से करीब 93 गुना अधिक है।
शुक्र और पृथ्वी इतने अलग कैसे बने, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इस अंतर को समझने के लिए आज के वायुमंडल के साथ यह भी देखना होगा कि क्या शुक्र पर कभी पानी था और ज्वालामुखियों ने वायुमंडल में कौन-सी गैसें जोड़ीं।
- लगभग 12,104 किमी व्यास पृथ्वी के व्यास का करीब 95%
- लगभग 467°C सौरमंडल के सभी ग्रहों में सबसे अधिक सतही तापमान
- पृथ्वी से करीब 93 गुना शुक्र की सतह पर वायुदाब
- अधिकतर कार्बन डाइऑक्साइड गर्मी का बाहर निकलना कठिन बनाने वाले वायुमंडल का मुख्य घटक
चमकीले बादल और घना वायुमंडल अलग-अलग काम करते हैं
शुक्र को ढकने वाले सल्फ्यूरिक अम्ल की बूंदों के बादल सूर्य के बहुत-से प्रकाश को परावर्तित करते हैं। इसी कारण शुक्र रात के आकाश में बहुत चमकीला दिखाई देता है। लेकिन बादलों से गुजरकर सतह को गर्म करने वाली ऊर्जा अवरक्त विकिरण के रूप में फिर ऊपर जाती है, और घना कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल इस विकिरण को बार-बार अवशोषित करके दोबारा उत्सर्जित करता है।
इस प्रक्रिया के कारण सतह की ऊर्जा के लिए अंतरिक्ष में निकलना कठिन हो जाता है। ग्रीनहाउस प्रभाव पृथ्वी पर भी होने वाली प्राकृतिक घटना है, लेकिन शुक्र के वायुमंडल की मात्रा और संरचना बहुत अलग है और इसी ने अत्यधिक गर्मी पैदा की। NASA शुक्र की आज की स्थिति को अनियंत्रित ग्रीनहाउस प्रभाव का परिणाम बताता है।
शुक्र के बादल सूर्य प्रकाश परावर्तित करते हैं, लेकिन उनके नीचे मौजूद विशाल कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल सतह की गर्मी का अंतरिक्ष में निकलना कठिन बना देता है।
शुक्र पर कभी महासागर था या नहीं, यह अभी पता नहीं है
शुक्र के वायुमंडल में सामान्य हाइड्रोजन की तुलना में भारी हाइड्रोजन यानी ड्यूटेरियम का अनुपात पृथ्वी से बहुत अधिक है। हल्का हाइड्रोजन अंतरिक्ष में अधिक आसानी से निकल जाता है, इसलिए यह अनुपात इस संभावना का समर्थन करता है कि अतीत में शुक्र पर आज से अधिक पानी था। लेकिन केवल इस माप से यह साबित नहीं होता कि सतह पर तरल महासागर मौजूद था।
वैज्ञानिक दो अलग इतिहासों की जांच कर रहे हैं। कुछ जलवायु मॉडल बताते हैं कि शुक्र इतना ठंडा हुआ होगा कि वहां उथला महासागर बना और लंबे समय तक हल्का मौसम रहा। दूसरी ओर, कुछ शोधों के अनुसार शुक्र शुरू से ही इतना गर्म था कि जलवाष्प बारिश बनकर नहीं गिरी और महासागर बन ही नहीं सका। वास्तविक इतिहास कौन-सा था, यह जानने के लिए वायुमंडल और चट्टानों की संरचना को अधिक सटीकता से मापना होगा।
“प्राचीन शुक्र महासागर” कई संभावित इतिहासों में से एक है। ड्यूटेरियम का ऊंचा अनुपात पानी खोने का संकेत है, किसी खींची गई तटरेखा या महासागर का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं।
बादलों के नीचे के ज्वालामुखी रडार से खोजे जाते हैं
घने बादलों के कारण दृश्य प्रकाश वाले कैमरे शुक्र की सतह नहीं देख सकते। NASA के Magellan अंतरिक्ष यान ने रेडियो तरंगें भेजीं और लौटे हुए संकेतों से सतह के 98% हिस्से का नक्शा बनाया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि शुक्र की सतह का कम से कम 85% भाग ज्वालामुखीय बहाव से ढका है।
शोधकर्ताओं ने 1990 और 1992 के रडार आंकड़ों की तुलना करके Sif Mons और Niobe Planitia के आसपास बदले हुए संकेत पाए। भूभाग की ढलान और बाधाओं को भी ध्यान में रखने पर, अभियान के दौरान बहकर जमी नई लावा इन बदलावों की सबसे उपयुक्त व्याख्या थी। विस्फोट का दृश्य सीधे रिकॉर्ड नहीं किया गया था, लेकिन ये आंकड़े दिखाते हैं कि 1990 के दशक की शुरुआत में शुक्र की सतह सचमुच बदली थी।
नए अभियान वायुमंडल और सतह की अलग-अलग जांच करेंगे
- वायुमंडल में नीचे उतरते समय योजना के अनुसार DAVINCI जांच यान गैसों की संरचना, दबाव, तापमान और हवाओं को मापेगा तथा बादलों के नीचे Alpha Regio की तस्वीरें लेगा।
- कक्षा से सतह को फिर देखते समय VERITAS की योजना 2031 के बाद नए रडार नक्शों, गुरुत्व और स्पेक्ट्रम आंकड़ों से ज्वालामुखियों और आंतरिक संरचना का अध्ययन करने की है।
- सतह के नीचे तक देखते समय ESA का EnVision नवंबर 2031 में प्रक्षेपण का लक्ष्य रखता है और रडार व स्पेक्ट्रोमीटर से भूमिगत संरचना, सतह और वायुमंडल को साथ देखने की योजना है।
तीनों अभियान अलग ऊंचाइयों और पदार्थों को मापेंगे, क्योंकि केवल एक प्रकार के आंकड़े शुक्र का इतिहास नहीं सुलझा सकते। वायुमंडलीय गैसें पानी खोने के समय को सीमित कर सकती हैं, जबकि सतह की चट्टानें और ज्वालामुखी बता सकते हैं कि ग्रह के भीतर से कौन-से पदार्थ ऊपर आए।
शुक्र दिखाता है कि केवल आकार से किसी ग्रह का भविष्य तय नहीं होता
शुक्र पृथ्वी के भविष्य की हूबहू तस्वीर नहीं है। वह तुलना का ऐसा उदाहरण है जो दिखाता है कि समान आकार से शुरुआत करने वाले ग्रह भी बहुत अलग वातावरण बना सकते हैं, यदि वायुमंडल की मात्रा, पानी की अवस्था, ज्वालामुखियों और चट्टानों में बदलाव लंबे समय तक जमा होते रहें।
शुक्र का चमकीला और चिकना दिखाई देने वाला बाहरी रूप उसकी ठोस सतह नहीं, बल्कि ऊंचे बादल बनाते हैं। सबसे गर्म जमीन और ज्वालामुखियों के निशान उनके नीचे छिपे हैं। रडार और वायुमंडलीय जांच यान इन दोनों परतों को जोड़कर यह क्रम खोज रहे हैं कि शुक्र आज की अवस्था तक कैसे पहुंचा।
