प्लूटो पर पानी की बर्फ पहाड़ बनाती है और नाइट्रोजन की बर्फ बहती है
प्लूटो की सतह का तापमान लगभग −226°C से −240°C तक रहता है। इस तापमान पर पानी की बर्फ इतनी कठोर होती है कि पहाड़ों को थाम सके। दूसरी ओर, बहुत लंबा समय मिलने पर नाइट्रोजन की बर्फ हिमनद की तरह बह सकती है। जहाँ इसकी परत मोटी होती है, वहाँ यह ठोस रहते हुए भी धीरे-धीरे ऊपर और नीचे जा सकती है। 2015 में New Horizons ने जिन पहाड़ों, हिमनदों और बहुभुज जैसी आकृतियों वाले मैदानों को खोजा, वे अलग-अलग प्रकार की बर्फ के अलग व्यवहार से बने हैं।
प्लूटो का व्यास लगभग 2,377km है, जो पृथ्वी के चंद्रमा के व्यास का करीब दो-तिहाई है। सूर्य से इसकी औसत दूरी लगभग 39AU है और सूर्य की एक परिक्रमा में इसे 248 वर्ष लगते हैं। इसकी कक्षा लंबी और अंडाकार है, इसलिए सूर्य से दूरी लगभग 30AU से 49AU के बीच बदलती रहती है। इन बदलावों के साथ सतह पर मौजूद नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड की कुछ बर्फ गैस बनती है या फिर जम जाती है और सतह तथा वायुमंडल के बीच आती-जाती रहती है।
- लगभग 2,377km प्लूटो का व्यास
- औसतन लगभग 39AU पृथ्वी से सूर्य की दूरी का करीब 39 गुना
- लगभग 153 घंटे प्लूटो को अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में लगने वाला समय
- लगभग 248 वर्ष प्लूटो को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगने वाला समय
पानी की बर्फ पहाड़ बनाती है, नाइट्रोजन की बर्फ बहती है
New Horizons की तस्वीरों में प्लूटो के कुछ पहाड़ 2–3km ऊँचे दिखाई देते हैं। नाइट्रोजन या मीथेन की बर्फ इतनी मुलायम है कि वह इतने ऊँचे पहाड़ों को लंबे समय तक नहीं थाम सकती। इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि ये पहाड़ मुख्य रूप से कठोर पानी की बर्फ से बने हैं। अवरक्त वर्णक्रम के अवलोकनों में भी बड़े इलाकों में पानी की बर्फ मिली है। कुछ स्थानों पर उसके ऊपर नाइट्रोजन, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड की बर्फ जमी है, जिससे पानी की बर्फ का संकेत छिप जाता है।
प्लूटो के बहुत कम तापमान पर भी पर्याप्त समय मिलने पर नाइट्रोजन की बर्फ हिमनद की तरह अपना आकार बदल सकती है। असली तस्वीरों में ऊँचे क्षेत्र से निचले बेसिन की ओर उसके बहने और रुकावटों के चारों ओर मुड़ने के निशान मौजूद हैं। पानी की बर्फ के टुकड़े आसपास की नाइट्रोजन बर्फ से कम घने होते हैं, इसलिए वे उसकी सतह पर ऊपर आ सकते हैं। ऐसे टुकड़े Sputnik Planitia के किनारे इकट्ठे हुए हैं।
प्लूटो पर “बर्फ” कहे जाने वाले सभी पदार्थ एक जैसे नहीं होते। पानी की बर्फ कठोर जमीन बनाती है, जबकि नाइट्रोजन की बर्फ हिमनद की तरह बहकर सतह बदलती है।
Sputnik Planitia में ठोस नाइट्रोजन बर्फ धीरे-धीरे घूमती है
दिल जैसी दिखने वाली Tombaugh Regio के पश्चिमी हिस्से में लगभग 1,000km चौड़ा Sputnik Planitia है। यह नीचा बेसिन एक विशाल हिमनद है, जिसमें मुख्य रूप से नाइट्रोजन की बर्फ और उसके साथ मीथेन तथा कार्बन मोनोऑक्साइड की बर्फ मिली हुई है। इसकी सतह पर 16–48km चौड़े बहुभुज जैसे क्षेत्र फैले हैं और टक्कर से बने गड्ढे लगभग दिखाई नहीं देते। इसका अर्थ है कि आसपास के अधिक गड्ढों वाले भूभाग की तुलना में इस मैदान की सतह पर बहुत बाद में नई बर्फ बिछी थी।
बहुभुज जैसे इन आकारों को उस मॉडल से समझाया जाता है जिसमें कई किलोमीटर मोटी ठोस नाइट्रोजन बर्फ बहुत धीरे-धीरे घूमती है। नीचे से थोड़ी गर्म हुई बर्फ ऊपर आती है, जबकि सतह पर ठंडी हुई बर्फ बहुभुजों के किनारों की ओर जाकर नीचे उतरती है। इसका अर्थ यह नहीं कि नाइट्रोजन तरल है या उबल रही है। इसका अर्थ यह है कि कठोर दिखने वाली ठोस बर्फ भी बहुत लंबे समय में चल सकती है और सतह को नई बर्फ से ढक सकती है।
कम गड्ढे देखकर वैज्ञानिक अनुमान लगा सकते हैं कि यह सतह दूसरे भूभागों के बाद बदली थी। लेकिन केवल तस्वीरों से यह नहीं पता चलता कि पूरे मैदान का हर हिस्सा ठीक कब बदला या सभी हिस्से एक ही गति से बदले थे या नहीं।
सतह की बर्फ प्लूटो के पतले वायुमंडल को भरती है
प्लूटो का वायुमंडल मुख्य रूप से नाइट्रोजन से बना है और इसमें मीथेन तथा कार्बन मोनोऑक्साइड भी हैं। सूर्य का प्रकाश जब सतह की नाइट्रोजन बर्फ को ठोस से सीधे गैस में बदलता है, तो वायुमंडल बढ़ता है। तापमान घटने पर उस गैस का कुछ हिस्सा फिर सतह पर जम जाता है। इसलिए वायुदाब केवल सूर्य से दूरी पर निर्भर नहीं है। किन इलाकों पर धूप पड़ती है और जमीन के नीचे बची गर्मी सतह का तापमान कैसे बदलती है, इसका भी असर पड़ता है।
New Horizons ने जब प्लूटो के पीछे से आ रहे सूर्य के प्रकाश के सहारे वायुमंडल को देखा, तो सतह से 160km से अधिक ऊँचाई तक धुंध की कई परतें दिखाई दीं। ऊपरी वायुमंडल में पराबैंगनी प्रकाश मीथेन को तोड़ता है और कई प्रकार के हाइड्रोकार्बन कण बनाता है। ये कण सतह पर गिरकर उस पदार्थ का हिस्सा बनते हैं जो जमीन को लाल-भूरा रंग देता है। धुंध स्वयं नीली दिखती है, क्योंकि उसके छोटे कण नीली रोशनी को अधिक अच्छी तरह बिखेरते हैं।
प्लूटो के सूर्य से दूर जाने पर वायुमंडल का बड़ा हिस्सा जम सकता है, लेकिन केवल दूरी से यह नहीं बताया जा सकता कि ऐसा कब होगा या कितना वायुमंडल बचा रहेगा। 2015 की नज़दीकी उड़ान ने प्लूटो की 248 वर्ष लंबी कक्षा के केवल एक समय को मापा था। लंबे समय के बदलाव जानने के लिए खगोलविदों को उन मौकों का अवलोकन जारी रखना होगा जब किसी तारे की रोशनी प्लूटो के वायुमंडल से होकर गुजरती है।
- ऊर्ध्वपातन धूप में आई नाइट्रोजन और मीथेन की कुछ बर्फ गैस बनकर वायुमंडल को भरती है।
- वायुमंडलीय परिवहन गैस दूसरे इलाकों में फैलती है और कम तापमान वाली जगहों पर फिर जम जाती है।
- हिमनद का बहाव जमी हुई नाइट्रोजन बर्फ ऊँचे क्षेत्रों से धीरे-धीरे Sputnik बेसिन की ओर जाती है।
- ठोस अवस्था में संवहन बेसिन की मोटी नाइट्रोजन बर्फ ऊपर-नीचे घूमती है और सतह पर नई बर्फ बिछाती है।
बड़ी दरारें बताती हैं कि जमीन के नीचे महासागर बचा हो सकता है
प्लूटो पर सैकड़ों किलोमीटर लंबी बड़ी दरारें हैं। यदि पूरा पिंड सिकुड़ा होता, तो सतह पर दबने और सिकुड़कर सिलवटें पड़ने के बहुत से निशान होने चाहिए थे। इसके बजाय, बर्फीली पपड़ी के खिंचकर फटने के निशान अधिक साफ हैं। एक मॉडल के अनुसार जमीन के नीचे का पानी धीरे-धीरे जमकर फैल गया होगा। दूसरे मॉडल में अभी बचा तरल पानी बर्फीली पपड़ी को बाहर की ओर धकेलता है। दोनों ही इन दरारों को समझा सकते हैं।
Sputnik Planitia का स्थान भी भूमिगत महासागर की संभावना का एक संकेत है। यदि इस बेसिन के नीचे तरल पानी बचा है, या नाइट्रोजन बर्फ की मोटी परत ने इसे आसपास से भारी बना दिया है, तो प्लूटो के घूमते समय बेसिन अपनी आज की जगह तक खिसक सकता था। लेकिन किसी परिक्रमा यान ने प्लूटो के गुरुत्व का विस्तृत नक्शा नहीं बनाया और वहाँ भूकंपीय तरंगें भी नहीं मापी गई हैं। इसलिए भूमिगत महासागर कई भू-आकृतियों को समझाने वाला मजबूत मॉडल है, सीधे देखा गया पानी का स्तर नहीं।
केवल एक अंतरिक्ष यान ने प्लूटो को पास से देखा है
New Horizons को 2006 में प्रक्षेपित किया गया था और वह 14 जुलाई 2015 को प्लूटो की सतह से लगभग 12,500km ऊपर से गुज़रा। अब तक प्लूटो का नज़दीक से अध्ययन करने वाला यह एकमात्र अंतरिक्ष यान है। इसके कैमरों, वर्णक्रममापियों और कण मापने वाले उपकरणों ने लगभग 6.25GB डेटा जुटाया, जिसे पूरा पृथ्वी तक भेजने में 15 महीने से अधिक लगे।
इस नज़दीकी उड़ान ने एक गोलार्ध के भूभाग और वायुमंडल की बनावट को विस्तार से दिखाया, लेकिन यह नहीं माप सकी कि वही क्षेत्र मौसमों के साथ कैसे बदलते हैं। भूमिगत महासागर का अस्तित्व, नाइट्रोजन बर्फ की परत की सही मोटाई और वायुदाब के लंबे समय के बदलाव अब भी अप्रत्यक्ष प्रमाणों पर निर्भर हैं। इन प्रश्नों के अधिक सटीक उत्तर के लिए प्लूटो की लंबे समय तक परिक्रमा करने वाले यान को अलग-अलग समय पर भूभाग, गुरुत्व और वायुमंडल का अध्ययन करना होगा।
बौने ग्रह की सतह भी लगातार बदल सकती है
अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ की 2006 की परिभाषा के अनुसार प्लूटो को बौना ग्रह माना गया। यह नाम सूर्य की परिक्रमा करने वाले पिंडों को वर्गों में बाँटने का एक नियम है; इसका अर्थ यह नहीं कि प्लूटो बर्फ का स्थिर गोला है। वहाँ पानी की बर्फ के पहाड़ उठे हैं, नाइट्रोजन के हिमनद बहते हैं और सतह की बर्फ वायुमंडल के साथ पदार्थ का आदान-प्रदान करती है। New Horizons ने दिखाया कि छोटे और बेहद ठंडे पिंड पर भी भू-दृश्य बदलता रह सकता है।
स्रोत
- NASA Science — Pluto Facts
- NASA Science — New Horizons
- NASA — Pluto’s Heart: Like a Cosmic “Lava Lamp”
- NASA — New Findings Shape Understanding of Pluto and Its Moons
- NASA — New Horizons Discovers Flowing Ices on Pluto
- NASA — Pluto’s Widespread Water Ice
- NASA Science — Pluto at Twilight
- NASA — Scientists Probe Mystery of Pluto’s Icy Heart
