सूर्य के सबसे निकट बुध पर बर्फ कैसे बची रह सकती है?
बुध सूर्य के सबसे निकट का ग्रह है, लेकिन वहाँ हर जगह हमेशा गर्मी नहीं रहती। धूप वाले दिन में सतह का तापमान लगभग 430°C तक पहुँच सकता है और लंबी रात में लगभग -180°C तक गिर सकता है, जबकि जिन ध्रुवीय गड्ढों तक कभी धूप नहीं पहुँचती उनमें पानी की बर्फ भी बची हुई है। एक ही ग्रह पर इतने अलग हालात इसलिए मिलते हैं क्योंकि बुध के पास गर्मी को इधर-उधर ले जाने वाला घना वायुमंडल नहीं है, उसका दिन बहुत लंबा है और उसकी घूर्णन धुरी लगभग झुकी हुई नहीं है।
इन तापमानों का अर्थ यह नहीं है कि पूरा बुध एक ही समय में 430°C और -180°C पर होता है। ये अलग-अलग स्थानों और समयों पर मिलने वाले प्रतिनिधि चरम मान हैं। बुध को समझने के लिए केवल सूर्य से उसकी दूरी नहीं, बल्कि यह भी देखना होगा कि धूप कहाँ पहुँचती है और कितनी देर तक पड़ती है।
- 88 पृथ्वी दिवस सूर्य का एक चक्कर, यानी बुध का एक वर्ष
- लगभग 59 पृथ्वी दिवस तारों के संदर्भ में एक बार अपनी धुरी पर घूमने का समय
- 176 पृथ्वी दिवस किसी स्थान पर एक दोपहर से अगली दोपहर तक का समय
- लगभग 430°C और -180°C दिन और रात में सतह के प्रतिनिधि चरम तापमान
सबसे निकट होने पर भी बुध सबसे गर्म ग्रह नहीं है
बुध का दिन बेहद गर्म होता है, लेकिन सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह शुक्र है। शुक्र का घना वायुमंडल गर्मी को आसानी से अंतरिक्ष में निकलने नहीं देता। इसके विपरीत, बुध के पास दिन की गर्मी को रोककर रात वाले हिस्से तक पहुँचाने के लिए हवा की मोटी परत नहीं है, इसलिए सूर्य डूबने के बाद उसकी सतह तेजी से ठंडी हो जाती है।
इसी कारण किसी ग्रह का तापमान केवल यह कहकर नहीं समझा जा सकता कि सूर्य के पास होने से उसे अधिक धूप मिलती है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि उसका वायुमंडल और सतह मिली हुई ऊर्जा को कितना जमा कर सकते हैं और कितनी दूर पहुँचा सकते हैं। बुध पर दिन और रात के तापमान में इतना बड़ा अंतर इसलिए बनता है क्योंकि यह दूसरी व्यवस्था लगभग काम ही नहीं करती।
बुध पर एक दिन, एक वर्ष से भी लंबा होता है
बुध का एक वर्ष पृथ्वी के समय के अनुसार लगभग 88 दिन का होता है। तारों को संदर्भ मानें तो बुध को अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करके फिर उसी दिशा की ओर देखने में लगभग 59 दिन लगते हैं। लगभग 176 दिनों में बुध सूर्य के दो चक्कर लगाता है और साथ ही अपनी धुरी पर तीन बार घूमता है। दो परिक्रमाओं और तीन घूर्णनों के इस तालमेल को 3:2 अनुनाद कहा जाता है।
बुध के अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा कर लेने का अर्थ यह नहीं है कि उसकी सतह से दिखने वाला सूर्य तुरंत आकाश में अपनी पुरानी जगह पर लौट आता है। बुध घूमते समय सूर्य के चारों ओर भी आगे बढ़ता रहता है। इसलिए किसी एक स्थान पर एक दोपहर से अगली दोपहर आने में लगभग 176 दिन लगते हैं। बुध की लंबी अंडाकार कक्षा में उसकी परिक्रमा की गति भी बदलती है, इसलिए कुछ क्षेत्रों में सुबह का सूर्य थोड़ी देर के लिए उगकर डूबता और फिर से उगता हुआ दिखाई दे सकता है।
बुध के गर्म और ठंडे हिस्सों को केवल सूर्य से उसकी दूरी तय नहीं करती। धूप कितनी देर पड़ती है और गर्मी ले जाने वाली हवा है या नहीं, ये बातें भी तापमान तय करती हैं।
कुछ गड्ढों तक एक बार भी धूप नहीं पहुँचती
बुध की घूर्णन धुरी उसकी कक्षा के तल पर खड़ी दिशा से केवल लगभग 2° झुकी है। इसलिए ध्रुवों के पास कुछ गहरे टक्कर-गड्ढों के तल पर सूर्य कभी क्षितिज से ऊपर नहीं आता। पूरा ध्रुव नहीं, बल्कि केवल ये स्थायी छाया वाले क्षेत्र इतने ठंडे बने रहते हैं कि पानी की बर्फ लंबे समय तक बच सकती है।
सबसे पहले पृथ्वी पर लगे रडार ने ध्रुवीय गड्ढों में ऐसी चमकीली परावर्तन तरंगें खोजीं जो बर्फ से अच्छी तरह मेल खाती थीं। बाद में MESSENGER ने तापमान, न्यूट्रॉन और सतह की चमक के आँकड़ों को मिलाकर इस निष्कर्ष को मजबूत किया कि ये जमाव मुख्य रूप से पानी की बर्फ हैं। कुछ बर्फ गड्ढे के तल पर खुली हो सकती है और कुछ सतह से कई दस सेंटीमीटर नीचे दबी हो सकती है।
बुध की ध्रुवीय बर्फ किसी तरल महासागर या जीवन का प्रमाण नहीं है। यह उन कुछ गड्ढों में सुरक्षित बर्फ है जहाँ धूप नहीं पहुँचती, और इसकी मात्रा, स्रोत तथा एक जगह से दूसरी जगह पहुँचने की प्रक्रिया पर अभी शोध जारी है।
हवा लगभग न होने से सतह सीधे अंतरिक्ष से मिलती है
बुध पूरी तरह निर्वात नहीं है, लेकिन वहाँ मौसम बनाने लायक घना वायुमंडल भी नहीं है। जब सौर पवन और छोटे उल्कापिंड सतह से टकराते हैं, तो ऑक्सीजन, सोडियम, हाइड्रोजन, हीलियम और पोटैशियम जैसे परमाणु बाहर निकलकर एक अत्यंत विरल बहिर्मंडल बनाते हैं। ये परमाणु अधिक समय तक वहाँ नहीं टिकते; वे अंतरिक्ष में निकल जाते हैं और फिर सतह से नए परमाणु उनकी जगह लेते हैं।
बुध के भीतर बनने वाला अपना चुंबकीय क्षेत्र भी है। सतह पर मापी गई इसकी शक्ति पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की लगभग 1% है, और इसका केंद्र बुध के केंद्र से उत्तर की ओर खिसका हुआ है। कमजोर चुंबकीय क्षेत्र और तेज सौर पवन के मिलने पर कण सतह की ओर उतरते हैं और फिर नए परमाणुओं को बाहर निकालते हैं। इस तरह बुध की सतह और उसके आसपास का अंतरिक्ष लगातार एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।
ग्रह पास है, फिर भी वहाँ पहुँचने में बहुत समय लगता है
बुध पृथ्वी की तुलना में सूर्य के अधिक पास है, लेकिन कोई अंतरिक्ष यान सीधे वहाँ जाकर आसानी से रुक नहीं सकता। अंदर की ओर जाते हुए यान की गति सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण बढ़ती है, इसलिए बुध की कक्षा में पहुँचने के लिए उसे अपनी गति बहुत घटानी पड़ती है। इसी वजह से MESSENGER और BepiColombo ने पृथ्वी, शुक्र और बुध के गुरुत्वाकर्षण का कई बार सहारा लिया।
- 1974–1975 Mariner 10 ने बुध के पास से तीन बार उड़ान भरी और उसकी सतह के एक हिस्से तथा उसके अपने चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन किया।
- 2011–2015 MESSENGER बुध की कक्षा में जाने वाला पहला यान बना और उसने सतह, रासायनिक बनावट, चुंबकीय क्षेत्र तथा ध्रुवीय बर्फ का अध्ययन किया।
- 2018–2025 प्रक्षेपण के बाद ESA और JAXA के BepiColombo ने ग्रहों के पास से नौ बार उड़ते हुए अपनी गति बदली।
- 2026–2027 के लिए निर्धारित 21 नवंबर 2026 को कक्षा में प्रवेश शुरू होगा और अप्रैल 2027 में नियमित वैज्ञानिक अवलोकन आरंभ होंगे।
अगस्त 2026 तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, BepiColombo के दो कक्षीय यान अलग-अलग दृष्टिकोणों से बुध की सतह और भीतरी भाग, चुंबकीय क्षेत्र और सौर पवन को मापेंगे। अगली बार बुध की तस्वीर देखते समय दिन में चमकते मैदानों और ध्रुवीय गड्ढों के काले तल, दोनों पर ध्यान दें। एक-दूसरे के विपरीत दिखने वाली गर्मी और बर्फ उसी ग्रह का रिकॉर्ड हैं, जो बताते हैं कि धूप अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समय तक पहुँचती है।
