नेपच्यून पर 2,000 किमी प्रति घंटे से तेज हवाएँ कैसे चलती हैं?
नेपच्यून सूर्य से पृथ्वी की तुलना में लगभग 30 गुना दूर है। वहाँ पृथ्वी पर पड़ने वाली धूप का केवल करीब नौ सौवाँ हिस्सा पहुँचता है, फिर भी बादलों की चाल से 2,000 किमी प्रति घंटे से तेज हवाएँ मापी गई हैं। इतनी कम धूप के बावजूद इन शक्तिशाली हवाओं को बनाए रखने में नेपच्यून के भीतर की गर्मी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह ग्रह सूर्य से जितनी ऊर्जा पाता है, उससे दोगुनी से भी अधिक ऊर्जा अंतरिक्ष में छोड़ता है। भीतर से आने वाली गर्मी और लगभग 16 घंटे में पूरा होने वाला तेज घूर्णन गहरे वायुमंडल को चलाते हैं, लेकिन दिखाई देने वाले बादलों के नीचे हवा कितनी गहराई तक बहती है, यह अभी पता नहीं है।
नेपच्यून का भूमध्यरेखीय व्यास लगभग 49,500 किमी है, यानी पृथ्वी के व्यास का करीब चार गुना। सूर्य की एक परिक्रमा में इसे लगभग 165 वर्ष लगते हैं, इसलिए इसका एक मौसम भी 40 वर्ष से अधिक चलता है। लंबे मौसम, तेज घूर्णन और भीतरी गर्मी एक साथ असर डालते हैं; इसीलिए किसी एक बादल या तूफान से पूरे ग्रह के मौसम को नहीं समझा जा सकता।
- लगभग 49,500 किमी भूमध्यरेखा के आर-पार मापा गया नेपच्यून का व्यास
- लगभग 30 AU पृथ्वी और सूर्य की दूरी का करीब 30 गुना
- लगभग 16 घंटे नेपच्यून के एक पूरे घूर्णन का समय
- 2,000 किमी/घंटा से अधिक बादलों का पीछा करके मापी गई सबसे तेज हवा
तस्वीरों में दिखने वाला गहरा नीला रंग नेपच्यून का असली रंग नहीं है
नेपच्यून का वायुमंडल मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम से बना है। इसमें मौजूद थोड़ी-सी मीथेन लाल रोशनी सोख लेती है, इसलिए ग्रह वास्तव में हल्का नीला-हरा दिखाई देता है। वॉयजर 2 ने 1989 में जो चित्र भेजे थे, उनमें से कई मशहूर गहरे नीले चित्रों के रंग और चमक-अंतर को बादल और तूफान साफ दिखाने के लिए बढ़ाया गया था। यूरेनस और नेपच्यून के चित्रों को एक ही तरीके से दोबारा तैयार करने पर उनके रंग का अंतर पुराने चित्रों जितना बड़ा नहीं दिखता।
रंग से वायुमंडल के पदार्थों का पता चलता है, लेकिन हवा की गति सीधे नहीं दिखती। अलग-अलग समय पर लिए गए चित्रों में बादल कितनी दूर खिसके, इसे देखकर वैज्ञानिक हवा की गति निकालते हैं। बादलों के ऊपरी हिस्से में मिली तेज गति का अर्थ यह भी नहीं कि वही गति ग्रह के भीतर तक जारी रहती है।
नेपच्यून के भीतर की गर्मी वायुमंडल को चलाती है
नेपच्यून सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा की तुलना में दोगुनी से अधिक ऊर्जा बाहर छोड़ता है। अतिरिक्त ऊर्जा को ग्रह बनने के समय से भीतर जमा गर्मी और अंदरूनी पदार्थों के धीरे-धीरे ठंडा होने तथा बदलने पर निकलने वाली ऊर्जा से समझाया जाता है। यह गर्मी निचले वायुमंडल को गर्म करके गैस को ऊपर-नीचे चला सकती है। तेज घूर्णन इस बहाव को पूर्व-पश्चिम दिशा की जेट धाराओं और भँवरों में बाँटने में मदद करता है।
फिर भी यह निश्चित नहीं है कि भीतरी गर्मी किस गहराई से निकलती है और 2,000 किमी प्रति घंटे से तेज स्थानीय हवाओं तक कैसे पहुँचती है। अब तक हवा की अधिकतर गति दिखाई देने वाले बादलों का पीछा करके मापी गई है। बादलों के नीचे का तापमान, संरचना और हवा सीधे मापने के लिए नेपच्यून की परिक्रमा करने वाले यान या वायुमंडल में उतरने वाले जाँच यान की जरूरत है।
नेपच्यून के वायुमंडल को चलाने वाली ऊर्जा केवल धूप से नहीं आती। ग्रह के भीतर से निकलने वाली गर्मी भी तेज हवाओं और भँवरों को बनाए रखने में मदद करती है।
विशाल काला धब्बा एक बड़ा तूफान है जो दिखाई देता है और फिर गायब हो जाता है
वॉयजर 2 ने 1989 में जो विशाल काला धब्बा देखा था, वह लगभग पृथ्वी जितना बड़ा भँवर था। लेकिन हबल ने 1994 में नेपच्यून की फिर तस्वीर ली तो वह धब्बा गायब हो चुका था। इसके बाद अलग-अलग अक्षांशों पर नए काले धब्बे दिखाई दिए और कुछ वर्षों में कमजोर होकर मिट गए। ये बृहस्पति के विशाल लाल धब्बे की तरह एक ही रूप में बने रहने वाला कोई एक तूफान नहीं हैं।
काले धब्बे के आसपास के चमकीले बादल शायद तब बनते हैं जब भँवर के साथ ऊपर उठती हवा ठंडी होती है और मीथेन की बर्फ जमती है। यहाँ “काला” किसी काले पदार्थ या ठोस सतह के छेद का नाम नहीं है। यह आसपास से कम रोशनी लौटाने वाली बादल की परत हो सकती है, या ऐसा क्षेत्र जहाँ से वायुमंडल की अधिक गहरी परत दिखाई देती है।
दूर मौजूद सूर्य भी बादलों की मात्रा बदल सकता है
शोधकर्ताओं ने 1994 से 2022 तक हबल, केक और लिक से मिले आँकड़ों की तुलना की। नेपच्यून के मध्य अक्षांशों पर बादलों की मात्रा सूर्य की गतिविधि के लगभग 11 वर्षीय उतार-चढ़ाव के साथ बदलती दिखाई दी। सूर्य की गतिविधि सबसे अधिक होने के करीब दो वर्ष बाद बादल बढ़ने की प्रवृत्ति भी मिली। यह उस व्याख्या से मेल खाता है जिसमें पराबैंगनी रोशनी ऊपरी वायुमंडल की मीथेन को तोड़ती है और प्रतिक्रिया से बने कण बढ़कर बादल बनने को प्रभावित करते हैं।
यह केवल आपसी संबंध है, इससे यह साबित नहीं होता कि कारण सूर्य की गतिविधि ही है। भीतर से उठने वाले तूफानी बादल किसी दूसरी प्रक्रिया से भी बन सकते हैं। बादलों की मात्रा 2019 में तेजी से घटने लगी और 2020 में 1994 के बाद के सभी अवलोकनों में सबसे कम रही। जिस ग्रह पर एक मौसम 40 वर्ष से अधिक चलता है, वहाँ यह बदलाव केवल एक वर्ष में हुआ। सूर्य की गतिविधि और बादलों का संबंध पक्का करने के लिए कई और 11 वर्षीय चक्रों तक देखना होगा कि यही बदलाव बार-बार होता है या नहीं।
वेब ने ध्रुवीय प्रकाश की जगह और ऊपरी वायुमंडल का तापमान दोनों मापे
वेब अंतरिक्ष दूरबीन ने 2023 में नेपच्यून के ऊपरी वायुमंडल से आने वाली अवरक्त रोशनी देखी। शोधकर्ताओं को आँकड़ों में H3+ के संकेत मिले। यह विद्युत आवेश वाला कण है जो ध्रुवीय प्रकाश बनने वाली जगह पर रोशनी छोड़ता है। 2025 में उन्होंने नेपच्यून पर ध्रुवीय प्रकाश की पहली पुष्टि की घोषणा की। चमकीला ध्रुवीय प्रकाश उत्तर या दक्षिण ध्रुव के पास नहीं, बल्कि भूमध्यरेखा के अधिक पास मध्य अक्षांशों पर दिखाई दिया। इसका कारण है कि नेपच्यून का चुंबकीय क्षेत्र ग्रह के घूर्णन अक्ष से लगभग 47° झुका हुआ है। प्रकाशित चित्र में नीला-हरा रंग माप को आसानी से पहचानने के लिए जोड़ा गया है; यह वह रंग नहीं है जो किसी व्यक्ति को वास्तव में दिखाई देगा।
उसी 2023 के स्पेक्ट्रम से मापा गया ऊपरी वायुमंडल का तापमान, वॉयजर 2 के 1989 के माप के आधे से बस थोड़ा अधिक था। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे नेपच्यून का तापमान आधा हो गया। इससे पता चलता है कि ध्रुवीय प्रकाश बनने वाली ऊँची वायुमंडलीय परत का तापमान कुछ दशकों में बहुत बदल गया। ऊपरी वायुमंडल का अनुमान से अधिक ठंडा होना यह भी समझाता है कि पुराने अवलोकनों में H3+ का उत्सर्जन खोजना कठिन क्यों था।
- बादलों की चाल अलग-अलग समय के चित्रों से बादलों की ऊपरी परत पर हवा की गति निकाली जाती है।
- ऊष्मीय विकिरण नेपच्यून को मिलने वाली धूप और उससे निकलने वाली ऊर्जा की तुलना करके भीतरी गर्मी का अनुमान लगाया जाता है।
- लंबे समय के चित्र काले धब्बों के बनने-मिटने और बादलों की मात्रा को वर्षों से दशकों तक देखा जाता है।
- अवरक्त स्पेक्ट्रम H3+ का उत्सर्जन और ऊपरी वायुमंडल का तापमान ध्रुवीय प्रकाश का वातावरण बताते हैं।
वॉयजर 2 अब भी नेपच्यून के पास जाने वाला एकमात्र अंतरिक्ष यान है
25 अगस्त 1989 को वॉयजर 2 ने नेपच्यून के बादलों के ऊपरी हिस्से से लगभग 4,800 किमी ऊपर से उड़ान भरी। इस एक उड़ान में विशाल काला धब्बा, छल्ले, छह नए चंद्रमा और ग्रह के केंद्र से हटा हुआ बहुत झुका चुंबकीय क्षेत्र मिला। लेकिन थोड़ी देर के लिए गुजरने वाला यान यह नहीं देख सकता था कि कोई तूफान कुछ वर्षों बाद कैसे गायब हुआ या ऊपरी वायुमंडल दशकों में कैसे बदला।
हबल और वेब ने बाद के बदलावों को दूर से देखना जारी रखा, फिर भी नेपच्यून की अंदरूनी बनावट और बादलों के नीचे की हवाओं का अनुमान अब भी परोक्ष रूप से लगाया जाता है। वर्षों तक परिक्रमा करने वाला यान और वायुमंडल में उतरने वाला जाँच यान साथ काम करें, तो वे अधिक सटीकता से पता लगा सकते हैं कि भीतरी गर्मी किस गहराई से निकलती है और वह ऊर्जा तेज हवाओं तक कैसे पहुँचती है।
नेपच्यून में बदलाव अलग-अलग ऊँचाइयों पर होते हैं
नेपच्यून को समझने के लिए केवल एक गहरे नीले चित्र पर भरोसा नहीं किया जा सकता; यह अलग करना जरूरी है कि हर अवलोकन ने क्या मापा। हल्का नीला-हरा रंग वायुमंडल के पदार्थ बताता है, चलते बादल हवा की गति दिखाते हैं और दिखाई देकर गायब होने वाले काले धब्बे बड़े भँवरों की उम्र बताते हैं। सूर्य की पराबैंगनी रोशनी ऊँचे बादलों को प्रभावित कर सकती है, भीतरी गर्मी गहरे वायुमंडल को चलाती है और झुका चुंबकीय क्षेत्र मध्य अक्षांशों पर ध्रुवीय प्रकाश की जगह तय करता है। ये सभी घटनाएँ एक ही ग्रह पर होती हैं, लेकिन इनका एक ही कारण नहीं है।
स्रोत
- NASA Science — Neptune Facts
- NASA Science — Voyager 2
- NASA — 30 Years Ago: Voyager 2 Explores Neptune
- NASA Science — Hubble Tracks the Lifecycle of Giant Storms on Neptune
- NASA Science — Neptune’s Disappearing Clouds Linked to the Solar Cycle
- NASA Science — Webb Captures Neptune’s Auroras for First Time
- NASA Science — Why Uranus and Neptune Are Different Colors
- NASA Science — NASA, Oxford Discover Warmer Uranus Than Once Thought
